शुक्रवार, 25 मार्च 2011

हे भगवान ! ये क्या हो गया


तुम जानते थे कि क्या होने वाला है
क्या हो रहा है, ये भी तुमसे छिपा नहीं था
सबकुछ होने में रजा थी तुम्हारी
तुम्हारी जिद थी
तुम साथ चले, साथ ही विश्राम किया
एक वो दौर भी था, जब मैं तुम्हारी सोच बना
लेकिन
तुम सबको झुठलाते रहे
तुम्हें लगा मैं सबकुछ भूल जाऊंगा
तुम्हारा प्यार, तुम्हारा दुत्कार
और खुद तुम्हें भी
लेकिन
तुम मेरे लिए कोई कोर्स नहीं थे
जिसे परीक्षा में पास होने के लिए याद करना था
तुम मन थे मेरे
जिसके बिना जिंदा लाश हूं मैं
तुमने छोड़ दिया मुझे
मैं खामोश हूं
तुम्हें दगाबाज भी तो अब नहीं कह सकता
तुन्हारे सामने तो कई बार कहा है
लेकिन
अब लब साथ नहीं देंगे
लेकिन
गुनाह तो हुआ है मेरे साथ
और हुआ है, तो गुनहगार भी होगा
तुम नहीं तो कौन ?
चलो तुम्हारी ही जुबान में कहता हूं
हे भगवान ! ये क्या हो गया

1 टिप्पणी:

अनाम ने कहा…

अतुल मैं पहली बार तुम्हारे ब्लॉग पर आया हूँ ...तुम्हारी कविता अद्भुत है...

आर के मिश्र